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इस कहानी को लिखने का मेरा कोई खास मकसद नही था। पहले पहल सोचा करता था की दुनिया में मकसद ही सब कुछ होता है पर अब नही। अब तो यह महसूस करता हूँ की कुछ बातें बिना किसी मकसद के भी ज़िन्दगी के लिए बहुत ज़रूरी हो जाती है। खैर इस विवाद में पड़ कर कहानी शुरू करता हूँ। बचपन की अनुभूतियाँ इकठ्ठा में कुछ समय तो लगता ही है और कई बार वो उलटी सीधी भी हो जाती है फ़िर भी मैं कोशिश करूंगा के अपनी पुरानी यादों को एक रूप दे सकूं। जब की यह बात है तब मैं छोटा ही तो था, शायद - वर्ष का रहा हूँगा। हमारे साथ वाला घर मिस वीनस का था जिसे मैं मिस्सी दीदी बोलता था। आज भी ख्यालों में उस की धुंधली सी तस्वीर उभर आती है तो आँखें नम सी हो जाती है। दरअसल उमर के बढ़ जाने से सब कुछ जैसे बदल सा जाता है। आज मैं और ही घटनायों के चकर्व्युह में इस कदर उलझा सा हूँ के मिस्सी दीदी को तकरीबन भूल ही तो गया था। पता नहीं आज अचानक फ़िर कहीं अतीत से उभर कर मिस्सी दीदी का चेहरा मेरी आंखों के सामने गया

आज मेरी आंखों के आगे पुराने दृश्य झिलमिला उठते है और उन के साथ ही मिस्सी दीदी का सुंदर चेहरा। लम्बाई करीबन साढ़े पाँच फीट, गोरा रंग, चेहरे पर कोई कील, फुंसी या तिल नहीं सुंदर नैन नक्श, भूरे रंग की बड़ी बड़ी आँखें और हाथों पर नरम नाजुक उँगलियाँ। और उँगलियों के छोरों पर पालिश किए हुए लंबे लंबे नाखून। सर पर सुनहरे बालों का एक गुछ्छा। यह चेहरा मेरे मन प्राण में इस तरह से घुल गया था के मैंने सोचा नहीं था के मैं उसे कभी यूँ भूल जाऊँगा।

पापा ने उन दिनों मिलिटरी हॉस्पिटल छोड़ कर सिविल हॉस्पिटल मैं ज्वाइन कर लिया था। कुछ देर बाद मिस्सी दीदी भी कहीं से ट्रान्सफर हो कर उसी हॉस्पिटल में गयी थी। वोह एक नर्स थी और उन्हें घर भी हॉस्पिटल की कालोनी में ही हमारे घर के साथ वाला मिला था। उनके साथ उनकी एक बड़ी दीदी थी जो की विधवा थी और अकेली ही मगन रहा करती थी। बस इन दोनों बहनों का और कोई सहारा था। मैंने पहले उन्हें कभी साडी पहने नही देखा था पर धीरे धीरे वो भारतीय पहरावे को अपनाने लगी थी। मिस्सी दीदी को मैंने कितनी पोशाकों में देखा था इसका कोई हिसाब नहीं। और पोशाक बदलने के साथ मनुष्य कितना बदल जाता है इसका भी हिसाब नहीं। मिस्सी दीदी से मैंने इंग्लैंड की बहुत सी कहानियाँ सुनी थी जैसे जब वहां बहुत बर्फ गिरती थी तो कैसे घर से निकलना कठिन हो जाता था। और ऐसे दिनों में वो घर पे बैठ कर अपनी मम्मी के पास काफी पीती थी और कहानियाँ सुना करती थी। फ़िर मिस्सी दीदी ने मुझे विंसेंट स्क्वायर के बारे में बताया था यहाँ उसे कितने ही लड़कों ने शादी का पर्स्ताव रखा था और उन में से कुछ तो कहते थी के अगर उन की शादी मिस्सी दीदी के साथ नहीं हुई तो वोह आतमहत्या कर लेंगे बगेराः बगेराः

जिस दिन मिस्सी दीदी ट्रान्सफर हो कर आयी हमारे पड़ोसी अमर नाथ की पत्नी जिन्हें मैं मौसी कह कर बुलाता था, वो मेरे बीजी के पास आयी और बोलीअरी बहिन इब तो म्हारे मुहल्ले में यह क्रिस्तिअनी भी गयी है, लेकिन क्या बताऊं गाल तो उस के ऐसे गोरे हैं के पूछो मत।

बीजी ने कहाअरे यह क्रिस्चियन लोग तो सभी गोरे ही होते है। हम ने क्या लेना देना है?”

अरी नहीं, जब तुम देखोगी तबी थने पता चलेगा के वो ऐसी वैसी मैम नाही, घुटनों तक का फ्राक पहन रखो है। मोहे तो लाज आवे ऐसन पहरावे को देख कर। ना जाने कैसी बेसरम है जो मर्दों के बीच टांग पे टांग रख कर चाय पीती है यह?”

लगता था मौसी जैसे काफी परभावित थी उस से। मैं भी बीजी के पास बैठा सारी बातें सुन रहा था और मेरे मन में भी मिस्सी दीदी के बारे में जानने की उत्सुकता पैदा हो गयी थी। मैंने पूछा, ” फ़िर क्या हुआ मौसी?”

मेरी और अब तक किसी का ध्यान ही नहीं था। मौसी ने चौक कर मेरी और देख कर कहा, ” हाय दैया, तूं म्हारी सब बातें सुन रहा था? शैतान कहीं का। सारी बातों में कान देता है?”

अब तो मेरी उत्सुकता और भी बाद गयी। मैंने पूछा, ” बताओ मौसी और क्या देखा?”

पर तब तक तो मौसी बीजी से कुछ और बत्याने लग गयी थी और इस परसंग को जैसे भूल ही गयी थी, बोलीका रे?”

मैंने कहा, “अरे मौसी बताओ ना इस बगल वाली मैम के बारे में?

अरे इब तक तूं वोही बात मन में सोच रहा है का? देख रही हो बहिन अपने छोरे की बुधी को? यह बड़ा हो कर सच में मैम ब्याह लायेगा। देख लेना तुम।मौसी ने बीजी को हाथ पर हाथ मारते कहा।

बीजी ने कहाहुंह..लायेगा यह मैम। अगर यह मैंम बैम लाया ना तो उस का झोंटा पकड़ कर बाहर ना कर दूँगी उसे? मैं अपने चौंके में भला मुर्गी-मछली लाने दूँगी? “

अगर छोरे ने पसंद कर ली तो तूं क्या करेगी बहिना?”

बीजी ने कहाअरे ऐसे कैसे उसे पसंद जायेगी? ऐसा किया तो ऐसे लड़के को भी निकाल दूँगी मैं घर से। विलायती बहू की जी -हुजूरी करना मेरे वश का रोग नहीं। हे मैया, रक्षा करना मेरी अम्बे माँ।

मौसी कहने लगीअरे इस मैम का सिंगार-पटार तो तो देखो, बाप रे बाप। अरे तुम जानत है के पहले हम यहाँ रहा करें वहाँ पर भी एक मैम होवे थी। अरे दैया का बताऊँ उस के बारे में इब? इब तो सब अलग थलग हो गयेवे। विल्याती बीबी के प्यार में उस के मरद ने अपनी घर तक को गिरबी रख दीया था। इब तो मने सुना है के वो मैम उस को लात मार कर अपने मुल्क को चली गयी।

बीजी ने कहाअरे कहीं सांप को वो भी केले और दूध पिला कर पाला जा सकता है?”

मेरी समझ में यह सब नहीं रहा था बस मेरी तो बड़ी इच्छा हो रही मिस्सी दीदी को देखने की। सब से उन का जिक्र सुन कर मिस्सी दीदी को देखने को बैचैन हो उठा। पर मुझे बड़ी झिझक हो रही थी मिस्सी दीदी के पास जाने में। सिर्फ़ दूर से ही एक दो दफा हास्पिटल के लिए ड्यूटी के लिए जाते ही देखा था।

एक दिन पापा हॉस्पिटल में ड्यूटी पर गए थे और बीजी किताब पढ़ते पढ़ते सो गयी थी। मैं धीरे से घर का दरवाजा खोल कर बाहर निकल आया और सीधा मिस्सी दीदी के घर चला गया। मुझे ना जाने कैसा डर सा लग रहा था। और मैंने पैर वापस जाने के लिया बढाये ही थे के पीछे से किसी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और एक आवाज़ आयीव्हाट नाऊँ ?”

पीछे मुड कर देखते ही मेरा समूचा बदन ठंडा पड़ गया। मिस्सी दीदी सामने खडी थी।
वही से फ़िर वोह बोली, ” कम इन
मैंने कहा, ” मैं अंग्रेज़ी नही जानता
लेकिन मिस्सी दीदी मेरा हाथ पकड़ कर सीधे कमरे में ले गयी। स्वय एक कुर्सी पर बैठ गयी और मुझे अपने सामने वाली कुर्सी पर बैठा लिया। मेज़ पर चाय का क्प पड़ा था जिस में से भांप निकल रही थी, बिल्कुल काली चाय बिना दूध के। मैंने पूछा, ” आप दूध क्यों नही डालती हो चाय में?”
हमे ऐसे ही पीना अच्छा लगता हैइतना कह कर दीदी ने क्प में से बड़ा सा सिप लिया और फ़िर इजी चेयर पर अपनी पीठ टिका दी।

क्या नाम है तुम्हारा?”
कुकू
कको ? यह भी कोई नाम है क्या? के, तुम हमे मिस्सी दीदी बोलने को मांगता है? ठीक है हम तुम्हारा मिस्सी दीदी है। तुम हमारा भाई होने को मांगता है? छोटा भाई? हमारा कोई भाई नही होता है। चलो हमे मिस्सी दीदी बोलो ना?”
मिस्सी दीदी
ओह थैंक यू। थैंक यू वैरी मच। बहुत अच्छा, हम तुम को चोकलेट देगा खाने को। और तुम मुझे क्या दोगे, ज़रा मैं भी सुनु?
मैं मिस्सी दीदी के बिल्कुल पास बैठा था और उस से आने वाली भीनी भीनी खुसबू बड़ी अच्छी लग रही मुझे। आहा कितनी मीठी सी खुसबू थी और कितनी पवित्रता का एहसास भी कराती थी जैसे। चोकोलेट से भी जयादा मीठी।
इस तरह क्यों देख रहा है?”
मुझे बड़ी शर्म सी आयी मैंने नज़रे झुका ली।
मिस्सी दीदी ने फ़िर पूछा, ” बोल ना क्या देख रहा था?”
मैंने कहा, ” सभी मेंम साहिबाएँ क्या तुम्हारी तरह ही सुंदर होती है मिस्सी दीदी?”
मेरी बात सुन कर मिस्सी दीदी हंसने लगी फ़िर बोली, ” तुम ने कितनी मेम साहिबयों को देखा है रे?”
मैंने कहाएक भी नहीं, सिर्फ़ तुम्हे ही देखा है बस। क्या सभी मेम साहिबाएँ इसी तरह की फ्राक पहनती है क्या?”
मिस्सी दीदी और भी ज़यादा हंसने लगी।फ्राक पहन क्या मैं ज़यादा सुंदर दीखती हूँ?”
मैंने कहाहाँ, तुम हमेशा फ्राक ही पहना करो।
मिस्सी दीदी ने कहाअरे तुम्हारा लोग बुरा मानता है कको। कहता है इस देश में बड़ा हो कर फ्राक पहनना नहीं मांगता।
मैंने कहामिस्सी दीदी, तुम्हारा माँ और पप्पा नहीं है क्या?”
मिस्सी दीदी यह प्रसन सुन कर गंभीर हो गयी और अचानक उस की आँखें नम सी हो गयी और उस ने टेबल से एक फोटो निकाली और बोलीयह हमारा पप्पा और मम्मा का फोटो होता वो हम को छोड़ कर अब जीसुस् क्राइस्ट के पास चला गया। तब हम बहुत रोया था, हमारा मम्मा पप्पा हम से बहुत बहुत प्यार करता था। उन दोनों का कार एक्सीडेंट हो गया था।
मैंने पूछातुम्हारा क्या कोई भाई भी नहीं है?”
मिस्सी दीदी ने कहातो क्या हुआ तूं जो अब मेरा भाई हो गया है।
मैंने पूछामिस्सी दीदी, शैतान लड़के क्या अच्छे होते हैं? मैं जब कोई शैतानी करता हूँ तो माँ मुझे बहुत डांटती है
मिस्सी दीदी ने कहाअरे शैतान लड़के तो बड़े अच्छे होते हैं, मुझे तुम जैसे शैतान लड़के अच्छे लगते है।इतना कह कर मुझे दीदी ने अपने पास खींच लिया और मेरे गाल पर एक बड़ा सा चुम्बन दे दिया और फ़िर बोलीअरे, तेरी माँ तो नाराज़ नहीं होगी तेरे यहाँ आने से?”
मैंने कहामाँ को कैसे मालूम होगा मैं यहाँ आया हूँ?”
दीदी ने कहाअगर माँ को पता चल गया तो?”
मैंने कहामाँ को नहीं पता चलने दूँगा दीदी।

बाकी अगले भाग में….

दोस्ती


अपने जब नही करीब होते हैं
वोह पल बड़े बदनसीब होते हैं

दोस्त के ऐब पर नही जाते,
दोस्त किस को नसीब होते हैं

दूरी का गम ना कर दोस्त
दोस्त तो दिल के करीब होते हैं

जब हम तुम मिल के चलते हैं
वोह दिन बड़े अजीम होते हैं

गम ना कर जहाँ के बातों का
दुनिया वाले तो रकीब होते हैं

कहीं दामन ना तूं छुडा लेना
ऐसे खयालात दिल्चीर होते हैं

यकीन चाहो तो आजमा लेना
यारी के हम फ़कीर होते हैं

दूर होते हो तो दिल तडपता हैं
तेरे पास खुशनसीब होते हैं

यह मेरी है दुआ खुश रहे तूं सदा
गम तो सीने में तीर होते हैं




ज़िन्दगी की कड़ियों को,
समेटना जो चाहा तो,
समेट नही पाया मैं।

लोग मिलते रहे और बिछड़ते गए।
सपने बनते रहे और सिमटते गए।
रिश्ते बनते रहे और टूटते गए।
घाव रिस कर नासूर बनते गए।

फ़िर ख़ुद को ख़ुद से,
जोड़ना जो चाहा तो,
जोड़ नही पाया मैं।

यादें आती रही और जाती रही।
एकांत में दर्द दिल में जगाती रही।
बंधन बंधते रहे और फ़िर टूटते गए।
मेरी जिदंगी को मुझ से लूटते गए।

फ़िर अपने आप पर,
हँसना जो चाहा तो,
हँस नही पाया मैं।

दिल रोता रहा और अश्क बहते रहे।
आँखें छलकी रहीं होंठ खिलते रहे।
ज़िन्दगी ज़िन्दगी से दूर होती गयी।
रौशनी फकत अंधेरों में खोती गयी।

फ़िर दुनिया से दिल,
जोड़ना जो चाहा तो
जोड़ नही पाया मैं।

सचाई दबती रही झूठ उभरता रहा।
आदर्श मिटते रहे और दर्द पलता रहा।
ख़ुद अपने से ही अजनबी बनता गया।
यही सिलसिला ज़िन्दगी में चलता गया।

इतना होने पर भी,
सम्भलना जो चाहा तो
संभल नही पाया मैं।

ज़िन्दगी की कड़ियों को,
समेटना जो चाहा तो,
समेट नही पाया मैं।

मेरा यह नेचुर के ऊपर एक ग़ज़ल लिखने का पहला प्रयासः है। उम्मीद करता हूँ आप को पसंद आएगी

आज सुबह जब मेरा बाग़--गुल से गुजर हुआ।
कुदरत के करिश्मे का दिल पे अज़ब असर हुआ।

हलकी फ़ैली थी धूप जैसे सफेद चादर का हो रूप,
ठंडी हवा चल रही थी जिस से बदन शरर शरर हुआ।

कहीं पर था गेंदा तो कहीं सूरजमुखी खिला हुआ,
हसीं कलीयों की खुश्बू से था गोशा गोशा तर हुआ।

मस्त भँवरें मंडरा रहे थे, फूलों का रस चुरा रहे थे,
औस की बूंदों से था घास का पत्ता पत्ता सरोवर हुआ।

पंछी चहचहा रहे थे , नए दिन के गीत गा रहे थे,
अज़ब वाताबरण था, अजीम खुदा का मंज़र हुआ।

एक असीम सी शांती थी, लगती स्वर्ग के भांती थी,
खूबसूरत लग रही थी दुनिया जैसे खुदा का घर हुआ।

पंछी! यह संदेशवा दे दो जब तुम गुजरो पी की नगरिया।
मोहे हर पल पी की याद सताए, मोरी छलक जाए है गगरिया।

वोह कहते थे के आयेंगे अब के सावन में।
एक अगन लगती जाए मोरे तन बदन में।
लगन में उनकी मीठा सा दरद है मन में।

धड़क जाए जियरा मोरा जब चमके वैरी बिजुरिया।
पंछी …………………………………………………..

नैनन में मोरे अन्सुयन की धारा है बह रही।
बिरहा में उनकी तड़प तड़प कर मैं हूँ मर रही।
आँखें थक गयी राह तक तक आए वोह अभी।

झनक झनक झन झनक झनक झन मोरी छनक जाए पायलिया
पंछी……………………………………………………..

जब भी सूर्य असत हो कर संध्या ढलती है।
रह रह कर मेरे दिल में उनकी याद पलती है।
उन बिन जीवन सूना लागे तन्हाई डसती है।

क्या कहूं तुम्हे पंछी? क्या बीते मोंपे बिन सांवरिया?
पंछी ………………………………………………………..

शाम के झुट्पते में
जब सूरज डूबता है
सागर किनारे बैठा मैं,
उस को निहारा करता हूँ
जिस की सुनहरी किरणे
रेत पर छिटक रही है
तो लगता है मुझ को ऐसे
जैसे एक मिलन हो रहा है
जा हो रही हो जुदाई
रात और दिन की

रेत पर बैठा मैं
कमज़ोर उँगलियों से
तेरा नाम लिख देता हूँ
और फ़िर मिटा देता हूँ
कौन जाने
तेरा मेरा भी
मिलन है या जुदाई है?

क्या कहें?

मय जो हम ने मांगी साकी से पिलाई गयी।
सामने जाम था प्यास हम से बुझाई गयी।

क्या कहें अब जुबां ही चुप सी रहती है,
क्या करें बात, बात हम से बनायी गयी।

जब भी गर्दन झुकाए तेरे आस्तां से गुज़रे हम,
आँख उठायी तो सही, पर आँख मिलाई गयी।

माना के तुम भूल गए, मुहब्बत की सभी कसमे,
क्या करें तेरी याद, बस हम से भुलाई गयी।

जानते हैं तुम्हे मिल जायेंगे राही और डगर में,
हमी से कोई सूरत, इस दिल में बसाई गयी।

चमन सेआशुगुजरने का अब दिल नही करता,
वोह चोट लगी है हम को, जो किसी से खाई गयी।

छोड़ा ऐसे तुम ने मुझ को, मेरा खो गया हर सहारा।
ना भुला पाया मैं तुझ को, तेरी याद ने मुझ को मारा।

दिल तब से टूट चुका है, जब से जुदा हुए तुम,
सब को मैं भूल चुका हूँ, मेरे खुदा हुए तुम,

अब तो डूबी हमारी कश्ती, मुझे तूं ही दिखा किनारा।
ना भुला पाया मैं तुझ को, तेरी याद ने मुझ को मारा

रो रो के कह रहा है , दिल मेरा आज तुम को,
हम बता ना पाए अपने दिल के राज़ तुम को,

बस हम ने लुटा दिया है, अपना यह ज़हान सारा।
ना भुला पाया मैं तुझ को, तेरी याद ने मुझ को मारा

ज़रा कुछ दर्द तो खाओ, मेरे दिल के हाल पे तुम,
अब तो निकाल जाओ, इस भंवर जाल से तुम,

अब तो थक चुका है, दिल भटक भटक कर बेचारा।
ना भुला पाया मैं तुझ को, तेरी याद ने मुझ को मारा

यादें

फ़िर तेरी याद ने इतना मुझे रुलाया है।
दर्द उतना ही बढ़ा जितना इसे दबाया है।

आंसू छलके ही रहे रोज़ मेरी आंखों से,
ज़ख्म जलते ही रहे बीती हुई बातों से,

आज यह दिन भी मुझे प्यार ने दिखाया है।
दर्द उतना ही बढ़ा जितना इसे दबाया है।

तन्हाई में मुझे फ़िर अतीत याद आता है,
जैसे दिल पे मेरे एक तीर सा चल जाता है,

अकेले में हम ने अपना दिल जलाया है।
दर्द उतना ही बढ़ा जितना इसे दबाया है।

अपने प्यार की अभी धूम भी मची तो थी,
साँसों में तेरी मेरी साँस अभी रची तो थी,

पर ज़फा से तेरी फूल प्यार का मुरझाया है।
दर्द उतना ही बढ़ा जितना इसे दबाया है।

याद है शाम वो जब तुम ने बातों बातों में,
संदेश कितने दिए थे तुम ने आँखों आखों में,

आखें तेरी है वही दिल ही अब पराया है।
दर्द उतना ही बढ़ा जितना इसे दबाया है।

कोई पूछे तो ज़रा ग़म के मज़े दिल से मेरे,
आंसू बह आते है बस नाम लेते ही तेरे,

यह किस मुकाम पर प्यार हमे ले आया है।
दर्द उतना ही बढ़ा जितना इसे दबाया है।

अब तो बस रोज़ मैं यह गीत लिखा करता हूँ,
मौत आती तो नही पर रोज़ मरा करता हूँ,

ग़म में हम ने यह दिल गीतों से ही बहलाया है।
दर्द उतना ही बढ़ा जितना इसे दबाया है।

कभी यूँ ही.


मेरी तन्हाई की हमराज़
तेरी रंग भरी याद!
करती है
वीरान दिल को आबाद !
तरीक ज़िन्दगी के,
उफक को
तेरी यादों के जुगनू
रोशन करते हैं।
लेकिन
फ़िर भी
कभी यूँ ही
जाग उठती है
सहसा
वोही रूहानी प्यास।
तुम्हारे करीब
बहुत ही करीब
आने की आस।
जी चाहता है
उसी तरह
फ़िर से
गुम हो जाऊं।
के बस
ख़ुद को भी
ढूंढ ना पाऊँ।
खो जाऊं
तुम्हारी
बाहों के हिसार में।
और
भूल जाऊं
हर रंजो-गम
तेरे प्यार में।
और
तुम
फ़िर से खेलो
मेरे गेंसूओं से।
के मैं
भूल जाऊं
कम्बखत आंसूओं को
जो तेरी याद में
बहा करते हैं।
और
जिन का कोई
वक़त मुक़रर्र नहीं
तुम्हारी याद की तरह
यह भी
मुसलसल है।
यूँ तो तेरी याद से दिल
बहला लेती हूँ
लेकिन
फ़िर यह नामुराद दिल
जिद पे जाता है।
और चाह्ता है
के फ़िर से
बैठे
गुलमोहरों के साये तले।
और
गिले शिकवे करें
फ़िर मिल के गले।
वोही प्यारी प्यारी
मीठी मीठी
बातें करे।
बिखरे हुए
सुराख़ सुराख़
फूल चुने।
और रंग भरे
खवाब
फ़िर से बुने।
फ़िर थक के
बाँहों में
सो जायें।
खवाबों की दुनिया में
खो जाएँ।
लेकिन
उफ़
यह रीत और रिवाज़ की आसीरी
यह तेरे मेरे बीच की दूरी।
यह हमारे मिलने की मजबूरी।
घुट के
रह जाते हैं
दिल में
सपने।
और कभी नही
होते यह
मेरे अपने।
लेकिन यह ख्वाब
तुम्हारे प्यार की तरह
पाकीजा है
लासानी है
इन्ही से मैं
दिल को बहला लेती हूँ।
लेकिन फ़िर भी।
कभी कभी।
सहसा
जाग उठती है
वोही पुरानी रूहानी प्यास
तुम्हारे करीब
बहुत करीब
आने की आस।

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