इस कहानी को लिखने का मेरा कोई खास मकसद नही था। पहले पहल सोचा करता था की दुनिया में मकसद ही सब कुछ होता है पर अब नही। अब तो यह महसूस करता हूँ की कुछ बातें बिना किसी मकसद के भी ज़िन्दगी के लिए बहुत ज़रूरी हो जाती है। खैर इस विवाद में न पड़ कर कहानी शुरू करता हूँ। बचपन की अनुभूतियाँ इकठ्ठा में कुछ समय तो लगता ही है और कई बार वो उलटी सीधी भी हो जाती है फ़िर भी मैं कोशिश करूंगा के अपनी पुरानी यादों को एक रूप दे सकूं। जब की यह बात है तब मैं छोटा ही तो था, शायद ८-९ वर्ष का रहा हूँगा। हमारे साथ वाला घर मिस वीनस का था जिसे मैं मिस्सी दीदी बोलता था। आज भी ख्यालों में उस की धुंधली सी तस्वीर उभर आती है तो आँखें नम सी हो जाती है। दरअसल उमर के बढ़ जाने से सब कुछ जैसे बदल सा जाता है। आज मैं और ही घटनायों के चकर्व्युह में इस कदर उलझा सा हूँ के मिस्सी दीदी को तकरीबन भूल ही तो गया था। पता नहीं आज अचानक फ़िर कहीं अतीत से उभर कर मिस्सी दीदी का चेहरा मेरी आंखों के सामने आ गया
आज मेरी आंखों के आगे पुराने दृश्य झिलमिला उठते है और उन के साथ ही मिस्सी दीदी का सुंदर चेहरा। लम्बाई करीबन साढ़े पाँच फीट, गोरा रंग, चेहरे पर कोई कील, फुंसी या तिल नहीं सुंदर नैन नक्श, भूरे रंग की बड़ी बड़ी आँखें और हाथों पर नरम नाजुक उँगलियाँ। और उँगलियों के छोरों पर पालिश किए हुए लंबे लंबे नाखून। सर पर सुनहरे बालों का एक गुछ्छा। यह चेहरा मेरे मन प्राण में इस तरह से घुल गया था के मैंने सोचा नहीं था के मैं उसे कभी यूँ भूल जाऊँगा।
पापा ने उन दिनों मिलिटरी हॉस्पिटल छोड़ कर सिविल हॉस्पिटल मैं ज्वाइन कर लिया था। कुछ देर बाद मिस्सी दीदी भी कहीं से ट्रान्सफर हो कर उसी हॉस्पिटल में आ गयी थी। वोह एक नर्स थी और उन्हें घर भी हॉस्पिटल की कालोनी में ही हमारे घर के साथ वाला मिला था। उनके साथ उनकी एक बड़ी दीदी थी जो की विधवा थी और अकेली ही मगन रहा करती थी। बस इन दोनों बहनों का और कोई सहारा न था। मैंने पहले उन्हें कभी साडी पहने नही देखा था पर धीरे धीरे वो भारतीय पहरावे को अपनाने लगी थी। मिस्सी दीदी को मैंने कितनी पोशाकों में देखा था इसका कोई हिसाब नहीं। और पोशाक बदलने के साथ मनुष्य कितना बदल जाता है इसका भी हिसाब नहीं। मिस्सी दीदी से मैंने इंग्लैंड की बहुत सी कहानियाँ सुनी थी जैसे जब वहां बहुत बर्फ गिरती थी तो कैसे घर से निकलना कठिन हो जाता था। और ऐसे दिनों में वो घर पे बैठ कर अपनी मम्मी के पास काफी पीती थी और कहानियाँ सुना करती थी। फ़िर मिस्सी दीदी ने मुझे विंसेंट स्क्वायर के बारे में बताया था यहाँ उसे कितने ही लड़कों ने शादी का पर्स्ताव रखा था और उन में से कुछ तो कहते थी के अगर उन की शादी मिस्सी दीदी के साथ नहीं हुई तो वोह आतमहत्या कर लेंगे बगेराः बगेराः ।
जिस दिन मिस्सी दीदी ट्रान्सफर हो कर आयी हमारे पड़ोसी अमर नाथ की पत्नी जिन्हें मैं मौसी कह कर बुलाता था, वो मेरे बीजी के पास आयी और बोली “अरी बहिन इब तो म्हारे मुहल्ले में यह क्रिस्तिअनी भी आ गयी है, लेकिन क्या बताऊं गाल तो उस के ऐसे गोरे हैं के पूछो मत।“
बीजी ने कहा ” अरे यह क्रिस्चियन लोग तो सभी गोरे ही होते है। हम ने क्या लेना देना है?”
” अरी नहीं, जब तुम देखोगी तबी थने पता चलेगा के वो ऐसी वैसी मैम नाही, घुटनों तक का फ्राक पहन रखो है। मोहे तो लाज आवे ऐसन पहरावे को देख कर। ना जाने कैसी बेसरम है जो मर्दों के बीच टांग पे टांग रख कर चाय पीती है यह?”
लगता था मौसी जैसे काफी परभावित थी उस से। मैं भी बीजी के पास बैठा सारी बातें सुन रहा था और मेरे मन में भी मिस्सी दीदी के बारे में जानने की उत्सुकता पैदा हो गयी थी। मैंने पूछा, ” फ़िर क्या हुआ मौसी?”
मेरी और अब तक किसी का ध्यान ही नहीं था। मौसी ने चौक कर मेरी और देख कर कहा, ” हाय दैया, तूं म्हारी सब बातें सुन रहा था? शैतान कहीं का। सारी बातों में कान देता है?”
अब तो मेरी उत्सुकता और भी बाद गयी। मैंने पूछा, ” बताओ न मौसी और क्या देखा?”
पर तब तक तो मौसी बीजी से कुछ और बत्याने लग गयी थी और इस परसंग को जैसे भूल ही गयी थी, बोली ” का रे?”
मैंने कहा, “अरे मौसी बताओ ना इस बगल वाली मैम के बारे में?
“अरे इब तक तूं वोही बात मन में सोच रहा है का? देख रही हो बहिन अपने छोरे की बुधी को? यह बड़ा हो कर सच में मैम ब्याह लायेगा। देख लेना तुम।” मौसी ने बीजी को हाथ पर हाथ मारते कहा।
बीजी ने कहा ” हुंह..लायेगा यह मैम। अगर यह मैंम बैम लाया ना तो उस का झोंटा पकड़ कर बाहर ना कर दूँगी उसे? मैं अपने चौंके में भला मुर्गी-मछली लाने दूँगी? “
“अगर छोरे ने पसंद कर ली तो तूं क्या करेगी बहिना?”
बीजी ने कहा “अरे ऐसे कैसे उसे पसंद आ जायेगी? ऐसा किया तो ऐसे लड़के को भी निकाल दूँगी मैं घर से। विलायती बहू की जी -हुजूरी करना मेरे वश का रोग नहीं। हे मैया, रक्षा करना मेरी अम्बे माँ। “
मौसी कहने लगी ” अरे इस मैम का सिंगार-पटार तो तो देखो, बाप रे बाप। अरे तुम जानत है के पहले हम यहाँ रहा करें वहाँ पर भी एक मैम होवे थी। अरे दैया का बताऊँ उस के बारे में इब? इब तो सब अलग थलग हो गयेवे। विल्याती बीबी के प्यार में उस के मरद ने अपनी घर तक को गिरबी रख दीया था। इब तो मने सुना है के वो मैम उस को लात मार कर अपने मुल्क को चली गयी।“
बीजी ने कहा ” अरे कहीं सांप को वो भी केले और दूध पिला कर पाला जा सकता है?”
मेरी समझ में यह सब नहीं आ रहा था बस मेरी तो बड़ी इच्छा हो रही मिस्सी दीदी को देखने की। सब से उन का जिक्र सुन कर मिस्सी दीदी को देखने को बैचैन हो उठा। पर मुझे बड़ी झिझक हो रही थी मिस्सी दीदी के पास जाने में। सिर्फ़ दूर से ही एक दो दफा हास्पिटल के लिए ड्यूटी के लिए जाते ही देखा था।
एक दिन पापा हॉस्पिटल में ड्यूटी पर गए थे और बीजी किताब पढ़ते पढ़ते सो गयी थी। मैं धीरे से घर का दरवाजा खोल कर बाहर निकल आया और सीधा मिस्सी दीदी के घर चला गया। मुझे ना जाने कैसा डर सा लग रहा था। और मैंने पैर वापस जाने के लिया बढाये ही थे के पीछे से किसी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और एक आवाज़ आयी ” व्हाट नाऊँ ?”
पीछे मुड कर देखते ही मेरा समूचा बदन ठंडा पड़ गया। मिस्सी दीदी सामने खडी थी।
वही से फ़िर वोह बोली, ” कम इन“
मैंने कहा, ” मैं अंग्रेज़ी नही जानता“
लेकिन मिस्सी दीदी मेरा हाथ पकड़ कर सीधे कमरे में ले गयी। स्वय एक कुर्सी पर बैठ गयी और मुझे अपने सामने वाली कुर्सी पर बैठा लिया। मेज़ पर चाय का क्प पड़ा था जिस में से भांप निकल रही थी, बिल्कुल काली चाय बिना दूध के। मैंने पूछा, ” आप दूध क्यों नही डालती हो चाय में?”
“हमे ऐसे ही पीना अच्छा लगता है” इतना कह कर दीदी ने क्प में से बड़ा सा सिप लिया और फ़िर इजी चेयर पर अपनी पीठ टिका दी।
“क्या नाम है तुम्हारा?”
“कुकू “
“कको ? यह भी कोई नाम है क्या? ओ के, तुम हमे मिस्सी दीदी बोलने को मांगता है? ठीक है हम तुम्हारा मिस्सी दीदी है। तुम हमारा भाई होने को मांगता है? छोटा भाई? हमारा कोई भाई नही होता है। चलो हमे मिस्सी दीदी बोलो ना?”
“मिस्सी दीदी“
“ओह थैंक यू। थैंक यू वैरी मच। बहुत अच्छा, हम तुम को चोकलेट देगा खाने को। और तुम मुझे क्या दोगे, ज़रा मैं भी सुनु?
मैं मिस्सी दीदी के बिल्कुल पास बैठा था और उस से आने वाली भीनी भीनी खुसबू बड़ी अच्छी लग रही मुझे। आहा कितनी मीठी सी खुसबू थी और कितनी पवित्रता का एहसास भी कराती थी जैसे। चोकोलेट से भी जयादा मीठी।
“ऐ इस तरह क्यों देख रहा है?”
मुझे बड़ी शर्म सी आयी मैंने नज़रे झुका ली।
मिस्सी दीदी ने फ़िर पूछा, ” बोल ना क्या देख रहा था?”
मैंने कहा, ” सभी मेंम साहिबाएँ क्या तुम्हारी तरह ही सुंदर होती है मिस्सी दीदी?”
मेरी बात सुन कर मिस्सी दीदी हंसने लगी फ़िर बोली, ” तुम ने कितनी मेम साहिबयों को देखा है रे?”
मैंने कहा ” एक भी नहीं, सिर्फ़ तुम्हे ही देखा है बस। क्या सभी मेम साहिबाएँ इसी तरह की फ्राक पहनती है क्या?”
मिस्सी दीदी और भी ज़यादा हंसने लगी। “फ्राक पहन क्या मैं ज़यादा सुंदर दीखती हूँ?”
मैंने कहा “हाँ, तुम हमेशा फ्राक ही पहना करो।“
मिस्सी दीदी ने कहा ” अरे तुम्हारा लोग बुरा मानता है कको। कहता है इस देश में बड़ा हो कर फ्राक पहनना नहीं मांगता।“
मैंने कहा ” मिस्सी दीदी, तुम्हारा माँ और पप्पा नहीं है क्या?”
मिस्सी दीदी यह प्रसन सुन कर गंभीर हो गयी और अचानक उस की आँखें नम सी हो गयी और उस ने टेबल से एक फोटो निकाली और बोली ” यह हमारा पप्पा और मम्मा का फोटो होता वो हम को छोड़ कर अब जीसुस् क्राइस्ट के पास चला गया। तब हम बहुत रोया था, हमारा मम्मा पप्पा हम से बहुत बहुत प्यार करता था। उन दोनों का कार एक्सीडेंट हो गया था।“
मैंने पूछा ” तुम्हारा क्या कोई भाई भी नहीं है?”
मिस्सी दीदी ने कहा ” तो क्या हुआ तूं जो अब मेरा भाई हो गया है।“
मैंने पूछा ” मिस्सी दीदी, शैतान लड़के क्या अच्छे होते हैं? मैं जब कोई शैतानी करता हूँ तो माँ मुझे बहुत डांटती है ।“
मिस्सी दीदी ने कहा ” अरे शैतान लड़के तो बड़े अच्छे होते हैं, मुझे तुम जैसे शैतान लड़के अच्छे लगते है।” इतना कह कर मुझे दीदी ने अपने पास खींच लिया और मेरे गाल पर एक बड़ा सा चुम्बन दे दिया और फ़िर बोली “अरे, तेरी माँ तो नाराज़ नहीं होगी तेरे यहाँ आने से?”
मैंने कहा ” माँ को कैसे मालूम होगा मैं यहाँ आया हूँ?”
दीदी ने कहा “अगर माँ को पता चल गया तो?”
मैंने कहा ” माँ को नहीं पता चलने दूँगा दीदी।“
बाकी अगले भाग में….







