कलम! जिस से मैं आज बरसों से अपने दिल की आवाज़ को लफ्जों मैं ढालता रहा हूँ , बहते हर आंसू को पोछता रहा हूँ , वह कलम जिस ने हर दुःख और हर सुख में मेरा एक खूबसूरत, दिलकश और पुर्सकूं साथी की मानीन्द साथ दिया है! जिस ने मुझे मेरे दुःख के लम्हों से उभारा है, सुख को और नीखारा है। मेरे माजी, मेरे अतीत को मुझ से आज तक बाँध कर रखा हैं!
कभी सोचता हूँ कहीं मेरी कलम मेरी बदनामी का कारण तो नहीं बनी, क्योंकी इसी के ज़रिये मैं ने अपने दिल के हर राज और तमाम वह बातें जो मैं महसूस करता हूँ उन्हें अल्फाज़ का रूप ब़ना कर मेरे दिल को एक खुली किताब बना दीया हैं! ऐसी बहुत सी बातें हैं, बहुत से उद्दगार हैं, बहुत सी भवनाये हैं जो मैं जुबान से नहीं कह पाता तब मेरी कलम ही मेरी जुबान होती हैं!
मैं लिखता हूँ तो फ़क़त इस लिए के मैं अपने दिल की बात किसी से बाँट सकूं न के इस लिए की किसी से पर्संसा हासिल करूं या किसी के दिल को दुखाऊँ ! अगर यह कलम मेरा साथ नही देती तो शायद मैं मैं न हो कर कुछ और ही होता क्योंकी यह मुझे मेरी कमियों और मेरी खूबियाँ एहसास कराती हैं ..खुदा से यही दुआ हैं की वह मेरे और मेरी कलम के इस प्यार को न सिर्फ़ बरकरार रखे बल्की इसे प्यार की इन्तीहां तक पहुँचा दे!
